जाने दो मुझे..
जीने दो इन्हे...!
में रूप की
रानी
थी
ख्वाबों की
शहज़ादी
थी
हज़ारों दिलों कि
धड़कन
थी
असल में मिट्टी
कि
पुतली
थी
पर
दो नन्हे फूलों कि माँ थी!
मिट्टी कि पुतली
थी
मिट्टी में मिलनी
थी
कभी न कभी तो
जाना
ही
था
थोड़ी जल्दी निकल
गयी!
गिला इस बात
का
नहीं
कि सफर यहीं
पे
खत्म
हुई
दर्द तो इस
बात
का
है
कि मेरे फूलों
को
गले
नहीं
लगा
पायी!
काश खुदा ने
थोड़ा
वक़्त
और
दिया
होता
मौत का कोई
पैगाम
दिया
होता
आगाह करदेती
इन
फूलों
को
ज़ालिम
ज़माने
के
बारे
में
लेकिन वक़्त को
कुछ
और
ही
मंज़ूर
हुआ
था!
ये वक़्त ने
कैसा
तमाशा
बना
दिया
क़फ़न ओढ़ाया और
मुझे
लाश
बना
दिया
हज़ारों आँखों से
बही
आसुओं
को
मेरे पैरों का
ज़ंजीर
बना
दिया!
कुछ लोगों ने
तो
मुझपर
ऊँगली
उठादिया
बेशरमी का हद
पार
करके
मेरे
रूह
को
हिला
दिया
काले लोक के
हैवानों
के
साथ
सम्बन्ध
का
किस्सा
बना
दिया
जाने के वक़्तमें
ये
कैसा
सज़ा
देदिया!
चूड़ियों कि
खनक
रुक
चुकी
है
मौत नागिन बनके
डस
चुकी
है
गुस्ताख़ दिल
कि
धड़कने
ठहर
गयी
है
चंदिनि हमेशा के
लिए
थम
चुकी
है!
वादा करो सब
लोग
जाने
से
पहले
कि प्यार इन्हे
मुझसे
भी
ज़्यादा
करोगे
फिसल जाये कभी
गलती
से,
तो माँ बनके
सही
रास्ता
दिखाओगे
!
अब जानेका
वक़्त
आचुका
है..
जाने दो मुझे
जीने दो इन्हे....!
आप कि
श्रीदेवी


